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ये भीड़ एक उम्मीद जगती है

Posted On: 15 Sep, 2011 Others में

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निश्चित ही ये भीड़ थी

जो उस दिन

इंडिया गेट और दिल्ली के

रामलीला मैदान में थी

उस भीड़ में पढ़े -लिखे भी थे

और अनपढ़ भी थे

professionals भी थे और

छात्र भी थे

वो महिलाएं भी थीं जो

अपना चूल्हा -चौका खत्म करके

आई थीं

और सुइट -पैंट पहने

‘मैडम’ भी थीं

मगर ये वो भीड़ नहीं थी

जो रैली में थैली लेकर जाती है

ये वो भीड़ भी नहीं थी जो

‘देशी’ पीकर जिंदाबाद -मुर्दाबाद

कहती है

इस भीड़ ने कोई बस नहीं तोड़ी

इस भीड़ ने कोई रेल नहीं रोकी

ये खुद को खुद से ही संभालती

एक दूजे के साथ

हाथ मिलाती भीड़ थी

ये भीड़ एक उम्मीद जगती है

भारत का भविष्य दिखाती है

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Roxanna के द्वारा
October 17, 2016

Wow I must confess you make some very trnchnaet points.

uma nath के द्वारा
December 5, 2011

बहुत ही सुन्दर रचना | धन्यवाद

    yogi sarswat के द्वारा
    September 7, 2012

    आभार आपका ! मेरे शब्द आपके दिल तक पहुंचे !

suresh bohra के द्वारा
December 5, 2011

बहुत बहुत ही सुन्दर

    yogi sarswat के द्वारा
    September 7, 2012

    धन्यवाद बोहरा जी ! मेरे शब्दों को आपका समर्थन मिला


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