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सब कुछ बिकता है ( चुनाव में धनबल और बाहुबल का औचित्य )

Posted On: 14 Feb, 2012 में

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राजनीति ! सच में देखा जाये तो एक ऐसा धंधा है जिस में एक बार निवेश कर दिया जाये तो आजीवन ही नहीं बल्कि सात पुश्तों तक और कुछ भी करने की आवश्यकता ही नहीं रहती ! अच्छा खासा रिटर्न मिलता रहता है , रुतबा और दबदबा अलग से ! तो फिर ऐसे धंधे में कौन नहीं आना चाहेगा ? अब वो दिन तो गए जब राजनीति को समाज सेवा माना जाता था , लेकिन नेता लोग अब भी इसे धंधा मानने को तैयार नहीं होते ! आपने देखा होगा सुना होगा , हर कोई राजनीतिक व्यक्ति राजनीति को समाज सेवा ही बताने की कोशिश करता रहता है जबकि हकीकत ये है कि इन राजनेताओं ने ही राजनीति को मुनाफे का धंधा बनाया है !
ऐसा नहीं है कि राजनीति में सब लोग ही पैसा बनाने या दबदबा बनाने के लिए ही आते हैं किन्तु ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं जो राजनीति को दुधारू गाय समझते हैं और येन केन प्रकारेण सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करते हैं !

चलता रहेगा ये कुर्सी का खेल !
फिर चाहे भारत लेने जाये तेल !!

राजनीति में धनबल :

भारतीय चुनाव आयोग , टी . एन. शेषन के समय से हर चुनावों में कुछ ना कुछ सुधार करने के लिए अंगड़ाई लेता रहा है ! यूँ चुनाव आयोग के सुधारों ने बहुत कुछ बदला भी है ! लेकिन उसे पूरी तरह सफल नहीं कहा जा सकता क्योंकि आज भी प्रदेश स्तर के चुनावों में जिस तरह से पैसे का बोलबाला है वो किसी से छुपा हुआ नहीं है ! उत्तर प्रदेश और पंजाब में पकडे गए करोड़ों रुपये ये बताने के लिए काफी हैं कि चुनाव आयोग कितना भी जोर लगा ले , प्रत्याशी पैसे से हर चीज़ को , यहाँ तक कि आम मतदाता के अधिकार को भी खरीद लेना चाहते हैं ! हमने वो समय भी देखा है जब , धन और रुतबे के दम पर गाँव के गाँव एक ही प्रत्याशी को वोट करने पर मजबूर हो जाते थे | ये सनातनी व्यवस्था कुछ बदली तो है किन्तु पूर्ण रूप से ख़त्म नहीं हुई | आज भी सामंतवादी सोच के लोग ये सोचते हैं कि साडी और कम्बल बाँट कर , घर घर में कलर टेली विज़न देकर वो वोटर को अपने लिए पक्का कर सकते हैं | उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि चुनाव आयोग क्या कहता है या कानून क्या कहता है ? ये लोग हमेशा चुनाव आयोग को अंगूठा दिखाने की कोशिश में रहते हैं , इन्हें ये लगता है कि उनके मुकाबले में चुनाव आयोग गरीब और सामान्य लोगों को लाकर खड़ा कर देना चाहता है ! ये लोकतंत्र को राजतन्त्र में बदलने के लिए आतुर हैं ! इन्हें चुनाव आयोग के फैसले इनकी सामंतवादी सोच पर प्रहार करते हुए लगते हैं | कुछ तो परिवारों ने राजनीति को और भारत में उच्च पदों को अपनी रखैल ही समझ रखा है | उन परिवारों में बच्चा जैसे पैदा ही “राजा ” बनने के लिए होता है , चाहे वो अक्ल से बिलकुल पैदल हो , चाहे वो चपरासी बनने की औकात ना रखता हो किन्तु वो भारत का प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने लग जाता है | और तो और उसका पूरा परिवार और उसके चमचे उसे इस देश का सर्व ज्ञाता , सर्व प्रिय बताने में कोई हिचक महसूस नहीं करते ! उसके पीछे चलने में जिन्हें अपनी इज्ज़त लगती हो , ऐसे लोग जब राजनीति में आते हैं तो कैसे भी इस देश को लूट लेना चाहते हैं !


ये शेरों का चरण पत्र है भेड़ सियारों के आगे
वाट वृक्षों का शीश नमन है खर पतवारों के आगे
जैसे कोई ताल तलय्या गंगा जमुना को डांटे
चार तमंचे मार रहे एटम के मुह पर चांटे
किसका खून नहीं खौलेगा पढ़ सुनकर अख़बारों में
शेरों की पेशी करवा दी चूहों के दरबारों में
इन सब षड्यंत्रों से पर्दा उठाना बहुत ज़रूरी है
पहले घर के गद्दारों का हटना बहुत ज़रूरी है
पांचाली के चिर हरण पर जो चुप पाए जाते हैं
इतिहास के पन्नो में वो सब कायर कहलाते हैं ……..


राजनीति अब कोई सैकड़ा -हज़ार का खेल तो रहा नहीं , लाखों और करोड़ों की बात होती है ! तो जब कोई लाखों करोड़ों खर्च करके इस देश का नीति निर्माता बनता है तो निश्चित रूप से वो इसका रिटर्न भी चाहता है , और फिर शुरू हो जाती है इस देश को और प्रदेश को लूट खाने की दौड़ ! आज हालात एकदम अलग हैं ! सफल नेता तभी बन सकता है जब उसके पास अगला चुनाव लड़ने के लायक जमा पूँजी हो | अगर कोई दो चुनाव हार गया तो वो तो खाली हाथ ही हो जायेगा , लेकिन एक बार मौका मिलते ही वो अपनी भरपाई करने लग जाता है , आखिर क्यों ना करे ? राजनीति तो आज धारावाहिक कार्यक्रम हो गई है , जो कि बिना पैसे के चल ही नहीं सकती | सत्ता के चैनल युद्ध में वही नेता या पार्टी सफलता हासिल कर सकती है जिसके पास मोटा प्रायोजक हो | बिना प्रायोजक के सत्ता संघर्ष में सफल होना बहुत मुश्किल माना जाता है ! क्योंकि चुनाव में शराब व नकद बांटने से लेकर जाने क्या क्या उपलब्ध कराना पड़ता है | और ये सब उपलब्ध कराने के लिए कोई व्यक्ति अपने घर को फूंक कर पैसा नहीं लगाएगा | सीधी सी बात है कि इसके लिए उसे इन्हीं स्रोतों से ही पैसा लगाना पड़ेगा और चुने जाने के बाद उनकी बात भी माननी ही पड़ेगी | आज के ओद्योगिक और आथिक साम्राज्य ऐसे ही नहीं खड़े हुए हैं ? आर्थिक रूप से उदार भारत में जितने विशाल आर्थिक साम्राज्य खड़े हुए हैं अगर उनकी नींव गहरे तक खोदी जाये तो हर जगह कुछ नियम और कानून दबे हुए कंकाल के रूप में मिलेंगे !

राजनीति में बाहुबल :

आज की राजनीति में अगर कर्पूरी ठाकुर होते तो शायद कहीं फिट नहीं बैठते ! अकेला चलो की राजनीति आज के दौर में केवल समय की बर्बादी और अपना धन खर्च करने के अलावा कुछ भी नहीं है ! जब तक सांय सांय करती , लाल बत्ती लगी गाडी सड़क पर सरपट दौड़ते हुए , यातायात नियमों को धता बताते हुए नहीं जाती तब तक किसी को पता ही कहाँ चलता है कि इस गाडी में हमारे नेता जी बैठे हैं या ये गाडी नेता जी की है !
चुनाव के समय में अगर प्रत्याशी एक अकेली गाडी लेकर निकल जाए तो पुलिस वाला ही उसे हड़का देगा इसलिए अपना रुतबा बनाये रखने के लिए उसे ना केवल ज्यादा गाड़ियाँ चाहिए होती हैं बल्कि उसकी धमक बनाये रखने के लिए गुंडों की फ़ौज भी रखनी ही पड़ती है ! नेता तो वही होगा ना जो अपने को औरों से अलग , सामान्य लोगों से ऊपर समझे ? नहीं तो फिर क्या सब नेता नहीं बन जायेंगे ? नेता को जब तक ये भ्रम ना हो जाये की वो इस दुनिया का नहीं है चाँद से उतर कर आया है तब तक वो कैसा नेता और कैसी नेता गिरी ?
हम खुद भी कहाँ सीधे साधे और सज्जान लोगों को अपना वोट देने की कोशिश करते हैं ? वोट तो बाद की बात है हम उसका नाम तक नहीं जानते लेकिन अगर हमारे क्षेत्र में कोई बाहुबली , गुंडा , मवाली , चोर , हिस्ट्रीशिटर चुनाव लड़ने के लिए आता है तो उससे पहले उसका नाम हमारे पास पहुँच जाता है | तो उसका चुनाव प्रचार तो ऐसे ही हो गया ! अब भारतीय कानून भी उसे कैसे रोकेगा , जब उस कानून की कोई परवाह ही नहीं करता | तो आधा चुनाव प्रचार तो उसका उसके द्वारा किये गए पुण्य कर्तव्यों से हो गया , बाकी का आधा प्रचार उसके गुंडे लोग धमका धमका के कर डालेंगे | बस बन गया काम ! अब वो जीतेगा , और धमकाएगा , उसके चेले चपाटे धमकाएंगे ! पहले अकेला वो ही पुण्य करता था , अब उसके सौ दो सौ समर्थक ये काम करेंगे | सैंयाँ भये कोतवाल तो अब डर काहे का ?

उत्तर प्रदेश के इन चुनावों में एक से एक महारथी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं , कुछ जीत भी जायेंगे , जो नहीं जीतेंगे वो फिर आयेब्गे दोबारा मैदान में ! जो जीत जायेंगे वो , हारे हुओं की भरसक मदद करेंगे ! आखिर चोर चोर मौसेरे भाई | क्या पता कल को वो जीत जायें और ये हार जायें , तब क्या होगा ? इसलिए हार जीत अपनी जगह , अपने सम्बन्ध अपनी जगह ! धंधा है भाई ! और धंधा कोई इतनी जल्दी थोड़े ही बंद कर देता है ?
उत्तर प्रदेश के चुनावों में किसी भी पार्टी ने ऐसे महाबली लोगों से मुंह नहीं मोड़ा है ! कम या ज्यादा सभी ने इन्हें अपने अपनी पार्टी का निमंत्रण पत्र थमाया ही है ! साफ़ सुथरी राजनीति करने का दम भरने वाली कॉंग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने भी इन्हें खूब मलाई बांटी है फिर ऐसे में कैसे और किससे उम्मीद करी जा सकती है कि इन चुनावों में कोई अपराधी तत्त्व नहीं जीतेगा ? एक पार्टी विशेष ने तो ढूंढ ढून्ढ कर ऐसे ही लोगों को टिकट थमाया है जिन पर कम से कम चार मुकद्दमे लगे हैं !
ये मेरे आसू जिन्हें कोई पोछने वाला भी नहीं ,
कोई आँचल इन्हे मिलता तो सितारे होते ||.

निष्कर्ष के तौर पर मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूँ कि कोई भी पार्टी ईमानदारी से धन और बाहुबल से पीछा नहीं छुड़ाना चाहती है ! सिद्ध्हंत अपनी जगह , सत्ता अपनी जगह ! सत्ता अगर मिले तो हर कोई अपने संस्कार त्यागने को तैयार बैठा है ! राजनीति , विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति ना तो धनबल और बहुबल के बगैर कभी चली है और ना ही इतनी जल्दी कोई उम्मीद बनती दिख रही है ! कहने वाले कह सकते हैं कि चुनाव आयोग इस दिशा में पूरा प्रयास कर रहा है किन्तु जब तक जन मानस , ऐसे लोगों को नकारना शुरू नहीं करेगा तब तक कोई भी सार्थक उम्मीद करना बेईमानी होगा ! हमें किसी और से नहीं बल्कि खुद से ये वादा करना ही होगा की हम ही इस तस्वीर के रंगों को बदल सकते हैं !
वह प्रदीप जो दीख रहा है
झिलमिल दूर नहीं है |
थक कर बैठ गए क्या भाई !

मंजिल दूर नहीं है !!


यह अतीत कल्पना,
यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना,
यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो,
युद्ध, संधि, क्रांति हो,
तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं,
देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है

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115 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Krystal के द्वारा
October 17, 2016

I love wool, whether it’s hardy Icelandic or soft fuzzy merino. Recently I’ve been knitting some cotton dishcloths as gifts and after a week of that I picked up a wool scafg-in-prorress and sighed out loud with relief at how nice it felt!

praveen के द्वारा
March 7, 2012

सही कहते हैं आप योगी जी ! आज राजनीती में सज्जन आदमी की कोई जगह नहीं है ! जब तक आपके पास खूब सारा अवैध धन न हो , गुंडे न हों तब तक राजनीती में कदम न तो रखा जा सकता है और न ही वहां जमा रहे जा सकता है ! बहुत बेहतर लेख !

    yogi sarswat के द्वारा
    March 12, 2012

    प्रवीण जी आपकी प्रतिक्रिया मिली , हार्दिक आभार ! होली की वजह से आपसे संपर्क में नहीं रह पाया , क्षमा चाहता हूँ ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

ajay kumar के द्वारा
March 4, 2012

योगी जी , आपने जो लेख दिया है वो निश्चित रूप से सोचने को विवश करता है की हम आज गुंडे मवालियों को अपना हीरो मानते हैं जबकि अन्ना जैसे सीधे साधे और देश भक्त लोगों पर शक करते हैं और उनसे उनके देश भक्त होने का प्रमाण मांगते हैं ! बहुत बढ़िया लेख ! लिखते रहिये !

    yogi sarswat के द्वारा
    March 5, 2012

    अजय कुमार जी , बहुत बहुत धन्यवाद !

    Jeanne के द्वारा
    October 17, 2016

    Oohh Camille don’t be sad. You will see them again soon. Just remember about all those happy memories that you shared with them. Even though it rained all the time. Just remember I am just across town. If you need to hang out with someone so you dont feel as lonely I am heiBterrt.any

meenakshi के द्वारा
March 2, 2012

योगी जी , आपने बेहद अच्छा लिखा है ; कुछ पंक्तियाँ विशेष हैं ,जैसे :- १-इन सब षड्यंत्रों से पर्दा उठाना बहुत ज़रूरी है पहले घर के गद्दारों का हटना बहुत ज़रूरी है ; २-वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है | थक कर बैठ गए क्या भाई ! मंजिल दूर नहीं है !! ३- तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं, देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है बहुत -२ शुभकामनाएं . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    yogi sarswat के द्वारा
    March 3, 2012

    आदरणीय मीनाक्षी जी , सादर नमस्कार ! आपकी सारगर्भित एवं विस्तृत प्रतिक्रिया मिली ! उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक आभार ! कृपया सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद !

yogeshkumar के द्वारा
February 29, 2012

योगीजी प्रणाम, आपका लेख पढ़ा…. आपने उम्दा तरीके से राजनीती की महिमा को बखान किया…… मगर मुझे लगता है कि राजनीती में धन बल, छल-कपट, बाहुबल, कोई नया नहीं है…. ये हर देश में, हर काल में, हर मनुष्य द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है…….. और किया जाता रहेगा…पौराणिक कथाओं में महाभारत उदहारण है….. जरूरत है इस धनबल का, बाहुबल का सही हाथों में आना….. वास्तव में राजनीती का मतलब ही राज करने कि नीति…..लोगों के तन में , लोगों के मन में राज करना …..आसान काम नहीं है…. राज करना ….बहुत पेंच है इस खेल में….. दिमाग का खेल है…. हम लोग केवल इस राजनीतिज्ञों कि हरकतों पे हो-हल्ला करते रहते है…. मगर होता कुछ नहीं है….. जरूरत अपने स्तर पे निडर होकर काम करने और अपने काम को सही करने की….. उदहारण है अरविन्द केजरीवाल ….. लगे रहिये अलख जलाते …. साधुवाद…

    yogi sarswat के द्वारा
    March 1, 2012

    योगेश कुमार जी नमस्कार ! आपकी आपकी अत्यंत विचारशील और विश्लेष्णात्मक प्रतिक्रिया मिली ! आपने जो सवाल उठाये हैं वो हर किसी के सवाल हैं , आपने उन्हें बहुत सही व्यक्त किया है ! बहुत बहुत आभार !सहयोग देते रहिये !

biswanath के द्वारा
February 28, 2012

आज के ओद्योगिक और आथिक साम्राज्य ऐसे ही नहीं खड़े हुए हैं ? आर्थिक रूप से उदार भारत में जितने विशाल आर्थिक साम्राज्य खड़े हुए हैं अगर उनकी नींव गहरे तक खोदी जाये तो हर जगह कुछ नियम और कानून दबे हुए कंकाल के रूप में मिलेंगे ! योगी जी नमस्कार ! बहुत गहरी बात कही है आपने ! सच में भारत देश की राजनीती बाहुबलियों और धन्बलियों के पांवो के नीचे दबी पड़ी है ! बहुत बढ़िया लेख !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 29, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया , बिस्वनाथ जी ! आपकी प्रतिक्रिया मिली ! हार्दिक धन्यवाद !

shivesh singh rana के द्वारा
February 28, 2012

योगी जी सादर, सीधे और स्पष्ट शब्दों में राजनीती नेताओ की बदनियती का दूसरा नाम मात्र रह गई है.

    yogi sarswat के द्वारा
    February 29, 2012

    शिवेश रना जी सादर ! आपकी बहुप्रतीक्षित और उत्साहजनक प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद !

s.pal के द्वारा
February 25, 2012

बिलकुल ठेक कहा आपने ! योगी जी ! आज की राजनीती सज्जन आदमी के लिए बची ही नहीं है ! आज की राजनीती में धन और बल का पूरा बोलबाला है ! लेकिन उम्मीद कर्निचाहिये की कभी न कभी तो पाप का ये घड़ा फूटेगा !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 27, 2012

    आपकी बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद !

manoj mahori के द्वारा
February 24, 2012

वाह वाह योगी जी आपके शब्द तो दिल को छु रहे हैं बस आप तो बस लिखते जाइये, धन्यवाद्

    yogi sarswat के द्वारा
    February 25, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद , माहोरी जी !

shiv के द्वारा
February 24, 2012

बिलकुल ठीक कहते हैं योगी जी ! लेकिन मुश्किल ये है हर बार वाही चेहरे दिखाई देते हैं इर किस पर भरोसा करे कोई ! बढ़िया लेख !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 24, 2012

    शुक्रिया !

sunit mittal के द्वारा
February 23, 2012

बहूत बढिया लिखा 

    yogi sarswat के द्वारा
    February 23, 2012

    धन्यवाद , सुनीत जी !

mparveen के द्वारा
February 22, 2012

योगी जी नमस्कार, बिलकुल सही कहा आपने ” सिधांत अपनी जगह हैं और सत्ता अपनी जगह ! सत्ता अगर मिले तो हर कोई अपने संस्कार त्यागने को तैयार बैठा है ! राजनीति , विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति ना तो धनबल और बहुबल के बगैर कभी चली है और ना ही इतनी जल्दी कोई उम्मीद बनती दिख रही है ! कहने वाले कह सकते हैं कि चुनाव आयोग इस दिशा में पूरा प्रयास कर रहा है किन्तु जब तक जन मानस , ऐसे लोगों को नकारना शुरू नहीं करेगा तब तक कोई भी सार्थक उम्मीद करना बेईमानी होगा ! हमें किसी और से नहीं बल्कि खुद से ये वादा करना ही होगा की हम ही इस तस्वीर के रंगों को बदल सकते हैं ! ” बिलकुल हर इंसान को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचना होगा तभी इन सब बिमारियों से मुक्ति मिल सकती है . बहुत सुंदर वर्णन किया आपने .. बहुत बहुत बधाई हो !!!! और माफ़ कीजियेगा इतने सारे ब्लॉग रोज पोस्ट होते हैं की कुछ पर कभी कभी नजर नहीं पड़ती और वो रह जाते हैं बिना पढ़े .. इन सब षड्यंत्रों से पर्दा उठाना बहुत ज़रूरी है पहले घर के गद्दारों का हटना बहुत ज़रूरी है

    yogi sarswat के द्वारा
    February 23, 2012

    आदरणीय परवीन जी , नमस्कार ! आपकी सारगर्भित और उत्साहित करने वाली प्रतिक्रिया मिली ! हार्दिक आभार ! आशीर्वाद बनाये रखियेगा !

    jlsingh के द्वारा
    March 1, 2012

    योगी जी, नमस्कार! बहुत ही सुन्दर और प्रेरक आलेख है आपका. राजनीती इतनी गंदी हो गयी है कि कोई भी अच्छा आदमी इस मैली गंगा में उतरना नहीं चाहता, पर मेरा मानना है कि जबतक अच्छे लोग नहीं आएंगे राजनीति में इसे साफ़ करने की हिम्मत नहीं दिखायेंगे यह दिन प्रतिदिन और मैली होती जायेगी और गंदे लोगों की जागीर बन कर रह जायेगी.

    yogi sarswat के द्वारा
    March 1, 2012

    आदरणीय श्री जे .एल .सिंह जी सदर नमस्कार ! आपकी प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया मिल जाती है तो सच कहूं लेखन सार्थक सा हो जाता है ! मार्गदर्शन देते रहिये ! बहुत बहुत शुक्रिया !

pushkar के द्वारा
February 22, 2012

बधाई योगी जी आपके सार्थक एवं यातार्थपरक लेख के लिए! बाते तो हम बहुत करते है लेकिन सिर्फ बातो तक ही क्यों सिमित रह जाते है? क्यों हम राजनीती में खुद नही आते?अगर हमे लगता है की राजनीती में केवल बेकार लोग ही आ गये है?इसे साफ करना भी तो हमारा ही दायित्व है.

    yogi sarswat के द्वारा
    February 22, 2012

    पुष्कर जी , आपकी उत्साहित करने वाली प्रतिक्रिया मिली ! बहुत बहुत आभार !

satya sheel agrawal के द्वारा
February 22, 2012

योगी जी ,अपने सही कहा पहले हमें स्वयं ही सुधरना होगा उसके पश्चात् ही नेताओं से बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं.

    yogi sarswat के द्वारा
    February 22, 2012

    श्री अग्रवाल जी , सादर नमस्कार ! आपकी उत्साहित करने वाली प्रतिक्रिया मिली ! बहुत बहुत आभार ! आशीर्वाद बनाये रखियेगा !

manojjohny के द्वारा
February 21, 2012

योगी जी क्षमा चाहूँगा देरी के लिए। आपने बहुत अच्छा विश्लेषण किया है। मेरा सिर्फ यही कहना है की राजनीति भी समाज का दर्पण है। जैसा समाज चाहेगा, जैसे लोगों को महत्व देगा, वैसे ही लोग राजनीति में दिखेंगे। नहीं तो जगमोहन जैसे नेता का हश्र देख लीजिये। जब तक मंत्री थे आए दिन उनके विभाग बदलते रहे, जम्मू कश्मीर के सबसे अच्छे राज्यपाल थे, पिछले चुनाव में एम पी भी नहीं बन पाये। मुझे लगता है, समाज के मनोभावों का विश्लेषण किए बिना, राजनीति को अकेले दोष देना काफी नहीं है। हो सकता है आप मेरी बात से सहमत ना हों, लेकिन ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। जनता भी वैसे लोगों को चुन रही है जिसे कहने के लिए बाहुबली … कहते हैं, और यह पूरे देश में है, केवल यूपी में नहीं। यह कहना की गुंडे डराकर वोट लेते हैं, ठीक नहीं है, क्योंकि वोट सबको दिखाकर नहीं दिया जाता। एकांत में भी अगर डरकर वोट देता है कोई, फिर तो पहले उस जनता को समझाना जरूरी है। हो सके तो समाज के ब्यवहार पर थोड़ा गौर कीजिएगा।

    yogi sarswat के द्वारा
    February 22, 2012

    मनोज जोनी जी नमस्कार ! आपकी बात से इत्तेफाक रखता हूँ की कहीं न कहीं राजनीती में आने वाला खिलाडी पहला ककहरा समाज से ही सीखता है ! जब हमारा समाज ही इस दिशा में आगे नहीं बढ़ना चाहता तो फिर राजनीतिक दलों और व्यक्तियों को ही दोष देना गलत होगा ! बहुत सार्थक प्रतिक्रिया !

jagobhaijago के द्वारा
February 21, 2012

भाई योगीजी, किसी कारण से आपकी पोस्ट इतने विलम्ब से पढने के लिए आपसे क्षमायाचना के साथ आपकी रचना में गहन चिंतन से निकले हुए विचारों को, शब्दों के समायोजन को,भावों सहित आपकी भावनाओं को,सर्वजन की पीडा को महसूस करते हुए ‘उठ खडे हाने के संदेश (थक कर बैठ गए क्या भाई..)’ देने को नमन एक ऐसी पीडा जिसको सभी महसूस तो करते हैं किन्तु शब्द नहीं दे पाते हैं उसे शब्दों में बाँधने लिए बधाई, क्या खूब लिखा है आपने …. आर्थिक रूप से उदार भारत में जितने विशाल आर्थिक साम्राज्य खड़े हुए हैं अगर उनकी नींव गहरे तक खोदी जाये तो हर जगह कुछ नियम और कानून दबे हुए कंकाल के रूप में मिलेंगे ….किन्तु,उत्तर प्रदेश की राजनीति ना तो धनबल और बहुबल के बगैर कभी चली है और ना ही इतनी जल्दी कोई उम्मीद बनती दिख रही है,के बारे कहना चाहूँगा कि  नर हो न निराश करो मनको…. काश! तथाकथित समाजसेवक इसे पढकर आत्ममंथन करें,  काश! घर के गद्दारो को हटाया जा सके…

    yogi sarswat के द्वारा
    February 22, 2012

    रतन साब , नमस्कार ! बहुत सारगर्भित और उद्देश्यपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ! आपकी बातों का तहे दिल से स्वागत करता हूँ और उम्मीद करता हूँ आप आगे भी यूँ ही सहयोग और समालोचना करते रहेंगे ! बहुत बहुत धन्यवाद !

Gopesh के द्वारा
February 21, 2012

योगी जी नमस्कार सराहनीय रचना के लिये बधाई स्वीकार करें! बहुत बढ़िया और सटीक लेख

    yogi sarswat के द्वारा
    February 22, 2012

    गोपेश जी नमस्कार ! आपके विचारों का हार्दिक स्वागत करता हूँ ! आशीर्वाद बनाये रखियेगा !

February 21, 2012

योगी जी नमस्कार ! आज के राजनैतिक माहौल का सटीक मूल्यांकन एवं विश्लेषण !! यथार्थ को दिखलाती रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई !!

    yogi sarswat के द्वारा
    February 22, 2012

    आदरणीय बाली साब , नमस्कार ! मेरे शब्दों को अगर आपके विचार मिल जाते हैं तो सच मानिए वो परिपूर्ण हो जाते हैं जैसे परस को छोकर पत्थर सोना बन जाता है ! आपके आशीर्वाद की उम्मीद में !

aarti singh के द्वारा
February 20, 2012

योगी सर , आप सही कहते हैं ! आज के दौर में राजनीती कोई समाज सेवा नहीं बल्कि एक बढ़िया धंधा बन गई है ! बढ़िया लेख !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    धन्यवाद ! आरती जी ! आपकी प्रतिक्रिया हमें उत्साहित करती है !

dineshaastik के द्वारा
February 20, 2012

यथार्थ के सटीक चित्रण करती सराहनीय रचना के लिये अधिकाधिक बधाई स्वीकार करें योगी जी।

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    दिनेश आस्तिक जी , सादर नमस्कार ! आपकी प्रतिक्रिया मिली ! उत्साह वर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ! आशीर्वाद बनाये रखियेगा !

r k diwakar के द्वारा
February 19, 2012

सही कहते हैं योगी जी आप ! धन बल और बहु बल तो हमेशा ही उत्तर प्रदेश के चुनावों में हावी रहा है

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    दिवाकर जी , बहुत बहुत शुक्रिया , मेरे शब्दों का समर्थन करने के लिए !

Diwakar के द्वारा
February 19, 2012

सच मे बहुत खूब काहा है य़ोगीजी ।

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    दिवाकर गंगवार जी बहुत बहुत शुक्रिया !

pankaj harihar के द्वारा
February 19, 2012

ये मेरे आसू जिन्हें कोई पोछने वाला भी नहीं , कोई आँचल इन्हे मिलता तो सितारे होते ||. योगी जी , आपकी लिखने की कला आकर्षित करती है ! आप जो अपने लेख में काव्य का उपयोग करते हैं वो तथ्यपरक और सटीक होता है ! आपने सही कहा है की हर कोई अगले चिनव लड़ने का प्रबंध कर लेना चाहता है और इसी भूख में वो कमी के लिए दौड़ लगा देता है इसमें कहीं न कहीं हमारे कानून भी उसे इस बात की छोट देता है क्योंकि उन्हें मालूम है की भारत का कमज़ोर कानून उनका कुछ नहीं बिगड़ सकय ! बढ़िया लेख !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    पंकज जी नमस्कार ! बहुत सार्थक और मौलिक प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! आशीर्वाद बनाये रखें !

yash pal के द्वारा
February 19, 2012

सब कुछ बिकता है , बहुत सही शीर्षक दिया है आपने !बहुत बढ़िया और सटीक लेख , योगी जी !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद ! यशपाल जी

aarti के द्वारा
February 18, 2012

अच्छा लेख ! बधाई ! लिखते रहिये

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    शुक्रिया , आरती जी !

lovely anand के द्वारा
February 18, 2012

आज के ओद्योगिक और आथिक साम्राज्य ऐसे ही नहीं खड़े हुए हैं ? आर्थिक रूप से उदार भारत में जितने विशाल आर्थिक साम्राज्य खड़े हुए हैं अगर उनकी नींव गहरे तक खोदी जाये तो हर जगह कुछ नियम और कानून दबे हुए कंकाल के रूप में मिलेंगे ! बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ लिखी हैं आपने योगी जी ! सही विश्लेषण और सटीक लेखन !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    आपकी कीमती और सार्थक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

anant singh के द्वारा
February 18, 2012

योगी जी , नमस्कार ! आपका लेख मिला ! बहुत खूबसूरत और बड़ा सटीक लेख लिखा है आपने ! बहुत बढ़िया ! लिखते रहिये !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    सिंह साब , बहुत बहुत शुक्रिया !

Dinesh Sharma के द्वारा
February 18, 2012

वह योगी जी आपका लेख पसंद आया ये तो पुरे देश की आवाज़ hai

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    दिनेश जी बहुत बहुत धन्यवाद ! आपने मेरे शब्दों को समय दिया !

susheel sharma के द्वारा
February 18, 2012

राजनीति तो आज धारावाहिक कार्यक्रम हो गई है , जो कि बिना पैसे के चल ही नहीं सकती | बहुत सही बात कही है , योगी सारस्वत जी आपने ! और इस पैसे को जाने कितना गुना करके वापस चाहते हैं ये राजनीती के महारथी ! बहुत सुन्दर लेख !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 21, 2012

    सुशील जी , नमस्कार ! आपकी प्रतिक्रिया मिली ! बहुत बहुत धन्यवाद !

    Tilly के द्वारा
    October 17, 2016

    What a great recuorse this text is.

Rajesh Kashyap के द्वारा
February 17, 2012

योगी सारस्वत जी, आपकी लाजवाब लेखनी, विद्वता, समझ, प्रस्तुति और आत्मियता को बार-बार सलाम। आपकी रचनाएं पढ़कर बहुत कुछ सिखने को मिला। निश्चित तौरपर जब तक आप जैसे विचारशील लेखक, कलम के सिपाही हैं, यह देश गौरवमयी रहेगा। इतने गंभीर लेखों और विचारों के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं।

    yogi sarswat के द्वारा
    February 17, 2012

    राजेश जी , नमस्कार ! आपका बहुत शुक्रिया की आपने इतनी सारगर्भित और प्रन्शाशानीय प्रतिक्रिया दी ! आशीर्वाद देते रहिये !

Alka Gupta के द्वारा
February 17, 2012

यथार्थपरक सार्थक लेखन योगी जी |

    yogi sarswat के द्वारा
    February 17, 2012

    आदरणीय अलका गुप्ता जी , सादर नमस्कार ! आपकी प्रतिक्रिया मिली ! हार्दिक धन्यवाद !

sinsera के द्वारा
February 17, 2012

योगी जी नमस्कार, बर्बाद गुलिस्तान करने को बस एक ही उल्लू काफी था , हर शाख पे उल्लू बैठे हैं अंजाम-ए-गुलिस्तान क्या होगा. अपने देश का तो यही हाल है आज कल, लेकिन आप लोगो की आवाज़ से लगता है कि अब बदलाव आने वाला है,आशावान रहें क्या ?????…..

    yogi sarswat के द्वारा
    February 17, 2012

    सिंसेरा जी , बहुत बहुत शुक्रिया , आपने बहुत सार्थक एवं सटीक प्रतिक्रिया मेरे शब्दों को दी ! सहयोग और क्रपा बनाये रखियेगा !

chaatak के द्वारा
February 16, 2012

स्नेही योगी जी, सादर अभिवादन, आपकी इस पोस्ट को पढ़कर दुष्यंत कुमार जी का एक शेर याद आता है- इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीक-ए-जुर्म हैं, आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार! सार्थक लेखन पर हार्दिक बधाई!

    yogi sarswat के द्वारा
    February 17, 2012

    चटक जी , बहुत बहुत आभार ! आपने मेरे शांदों को समय और अपने विचार दिए ! आशीर्वाद बनाये रखिये ! धन्यवाद !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 17, 2012

    माफ़ करें ! चातक जी पढियेगा ! धन्यवाद !

prem kumar के द्वारा
February 16, 2012

योगी जी नमस्कार आपने बहुत सुन्दर लेख लिखा है | मैं आप की बात का समर्थन करता हु |

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया , प्रेम साब ! सहयोग देते रहिये !

Rakesh के द्वारा
February 16, 2012

बहुत ही अच्छा लेख समसामयिक विषय पर. बधाई.

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    राकेश जी ! सादर नमस्कार ! आपकी प्रतिक्रिया मिली, हार्दिक धन्यवाद ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com

vijay pratap yadav के द्वारा
February 16, 2012

Sir…..Laxmi..to…hr,..ek.kam.me…..age…hi…..aati.hai.es.liye…jiske.pass.paisa……hai……to.layaga.hi.kyo.ki……..ab.rajniti….desh.ke.liye.nahi.apne.liye……..krta.hai….ese…..lye.to….jnta….brbad.hai.aur.neta.mala-mal……hai……

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद, विजय जी !

saurabh के द्वारा
February 16, 2012

योगी जी मैं आप से सहमत हू.और यही कहूँगा की यदि हम सब एक हो कर इसी तरह ये लड़ाई जरी रखते है तो जो परिवर्तन पिछले समय मैं आया है उससे कही अधिक परिवर्तन आने वाले समय मैं होगा किउ की पहले की भोली जनता अब ये जान चुकी है की किया सही है और किया गलत .वो सब जानती है नेता इस देश का क्या कर रहे है पर कुछ दलबदलू और चापलूसों की वजह से हम थोडा कम कामयाब हो पा रहे है .इसके अतिरिक्त कुछ सुधर तो अपने मैं ही करना होगा .तो छोटा मोटा भ्रस्ताचार तो अपने आप ही मिट जायेगा .लकिन ये तो है के कुछ करती सी तो आई है पिछले कुछ दिनों मैं और ऐसे ही आप और हम लगे रहे तो जरूर कुछ न कुछ तो होगा. जय हिंद

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया , सौरभ जी ! आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया मिली ! सहयोग बनाये ताखियेगा !

    Belle के द्वारा
    October 17, 2016

    At a Fortune 500 insurance company who is very pralitobfe, our I/T dept was hit major outsourcing in April and July, and there are no jobs in the whole South Florida area as the rest of the major IBM shops down here have all outsourced. So, it looks to me like corporate execs salute the green and not the red, white and blue.

D.K.Saraswat के द्वारा
February 16, 2012

योगी जी को सादर नमस्कार बहुत सार्थक और सटीक लेख लिखा है  अब वफ़ा की उम्मीद भी किस से करे भला, मिटटी के बने लोग कागजो में बिक जाते है

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    धीरेन्द्र कुमार जी , नमस्कार ! बहुत सटीक और सही शब्दों में दी गई आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक सागत करता हूँ ! कृपया सहयोग और समर्थन बनाये रखें ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com

akraktale के द्वारा
February 15, 2012

योगी जी नमस्कार, बहुत सुन्दर विश्लेषण.

अलीन के द्वारा
February 15, 2012

योगी सारस्वत जी, सादर नमस्कार! सार्थक लेख……. बधाई हो कृपया मेरी प्रेम कहानी जरुर पढियेगा….मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    अलीन जी , मेरे शब्दों को समय आयर समर्थन के लिए बहुत बहुत आभार ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com

nishamittal के द्वारा
February 15, 2012

बहुत सटीक विश्लेषण

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    निशा मित्तल जी , सादर नमस्कार ! आपका समर्थन मिला , बहुत बहुत शुक्रिया ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com

Dev sharma के द्वारा
February 15, 2012

आज के ओद्योगिक और आथिक साम्राज्य ऐसे ही नहीं खड़े हुए हैं ? आर्थिक रूप से उदार भारत में जितने विशाल आर्थिक साम्राज्य खड़े हुए हैं अगर उनकी नींव गहरे तक खोदी जाये तो हर जगह कुछ नियम और कानून दबे हुए कंकाल के रूप में मिलेंगे ! बहुत सटीक लाइनों का प्रयोग किया है आपने योगी सारस्वत जी ! बहुत सार्थक और व्यावहारिक लेख !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    देव साहब ! सादर नमस्कार ! आपकी बहु प्रतीक्षित और सार्थक प[अर्तिक्रिया मिली , बहुत बहुत आभार ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 15, 2012

योगी जी,सादर नमस्कार दुर्भाग्य ही तो है ये सब जो हमारे देश को बिना किसी मोह और माया के चलाने के दावे करतें है उनकी तिजोरियों में इतना धन जमा हो चुका है की गिना भी नहीं जाता होगा आपके लेखों में गध-पध का बहुत ही सुन्दर चित्रण रहता है यहाँ सुन्दर का अर्थ सामर्थ से है मैं ज्यादा तो नहीं कहूंगा किन्तु आपकी दो लाइनें सोचने को मजबूर करती है किसका खून नहीं खौलेगा पढ़ सुनकर अख़बारों में शेरों की पेशी करवा दी चूहों के दरबारों में II पांचाली के चिर हरण पर जो चुप पाए जाते हैं इतिहास के पन्नो में वो सब कायर कहलाते हैं …….. वास्तव में आज जो चुप बीतें है उन्हें भी कायर से ज्यादा कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती सार्थक लेख आपका

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    आनंद प्रवीन जी , सादर नमस्कार ! आपकी बातों का शत प्रतिशत समर्थन करते हुए आपका बहुत बहुत आभार व्यक्त करता हूँ ! कृपया अपना समर्थन देते रहे ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com

manoj pandit के द्वारा
February 15, 2012

राजनीति तो आज धारावाहिक कार्यक्रम हो गई है , जो कि बिना पैसे के चल ही नहीं सकती | बहुत सुन्दर पंक्तियों का उपयोग किया है आपने योगी जी अपने लेख में ! बहुत सुन्दर ,सार्थक और सटीक लेख ! बाहुबलियों और धन कुबेरों ने एक तरह से लोकतंत्र को बंधक बना रखा है !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया , मनोज जी ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com

    Valjean के द्वारा
    October 17, 2016

    Sadly, there is no progressive station in South Florida. I listen to the internet and Sirius radio mostly. Randi Rhodes is on in Palm Beach 1230 am from 3-6 but that is about it. I listen to local host Nicole Sandler on Radcoornot.iom from 10-12.

Santosh Kumar के द्वारा
February 15, 2012

योगी जी ,.नमस्कार शानदार लेखन आपका ,..बहुत बधाई

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    संतोष कुमार जी , आप्की प्रतिक्रिया मिली ! बहुत बहुत आभार ! आशीर्वाद बनाये रखें ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com

vinod kumar के द्वारा
February 15, 2012

आंसुओं की यह डुगडुगी नाच रहे सब लोग कोई रोटी मांगता कहीं अपच का रोग ||

    yogi sarswat के द्वारा
    February 16, 2012

    धन्यवाद !

sumit के द्वारा
February 15, 2012

योगी जी आपका लेख अच्छा लगा  

    yogi sarswat के द्वारा
    February 15, 2012

    thank you very much , sir !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 15, 2012

    पियूष पन्त जी , बहुत स्वाभाविक रूप में रची गई , वीर रस की कविता के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/02/07

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 14, 2012

आदरणीय योगी जी, सादर अभिवादन. वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है | थक कर बैठ गए क्या भाई ! मंजिल दूर नहीं है !! मंजिल दूर , मंजिल दूर इससे न घबरा. बधाई.

    yogi sarswat के द्वारा
    February 15, 2012

    आदरणीय , प्रदीप कुशवाहा जी आपका आशीर्वाद मिला , प्रसन्नता हुई की आपको मेरे शब्द पसंद आये ! उम्मीद करता हूँ आपका सहयोग और आशीर्वाद यूँ ही मिलता रहेगा ! yogensaraswat.jagranjunction.com

shashibhushan1959 के द्वारा
February 14, 2012

मान्यवर योगेन जी, सादर ! “”किसका खून नहीं खौलेगा पढ़ सुनकर अख़बारों में शेरों की पेशी करवा दी चूहों के दरबारों में इन सब षड्यंत्रों से पर्दा उठाना बहुत ज़रूरी है पहले घर के गद्दारों का हटना बहुत ज़रूरी है”" . बहुत उत्तेजक पंक्तियाँ ! सोचने को मजबूर करती हैं ! लेकिन अब इन धनबलियों और बाहुबलियों का सत्यानाश होने ही वाला है. बस थोड़ा समय और ….! धन्यवाद !

    yogi sarswat के द्वारा
    February 15, 2012

    श्री शशी भूषण जी सादर नमस्कार ! आपके विचार जब मिलते हैं तो लगता है की लेखन सार्थक हुआ और ख़ुशी इस बात की होती है की मेरा लेखन सही दिशा में जा रहा है , आपके विचार मुझे हमेशा प्रोत्साहित करते हैं ! अपना आशीर्वाद देते रहिएगा ! yogensaraswat.jagranjunction.com


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