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खण्ड खण्ड होता लोकतंत्र

Posted On: 29 Nov, 2012 Others में

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लोकतंत्र की बात जब जब आती है मुझे दो महान लोगों का नाम याद आ जाता है ! पहला – अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जिन्होंने लोकतंत्र को परिभाषित किया और , दूसरा – बर्मा की आंग सान सू की का !

अब्राहम लिंकन ने कहा -

Government of the people, by the people, for the people

ऐसी ,व्यवस्था  जहां सामान्य लोगों द्वारा , सामान्य लोगों के  लिए , सामान्य लोगों के द्वारा चलायी जाने वाली सरकार हो ! मतलब , एक ऐसी व्यवस्था जिसमें हर कोई भागिदार हो !

अब बात करते हैं बर्मा की आंग सान सू की के विषय में ! नवम्बर 2010 में जेल से रिहा होने से पहले वो लगभग 20 साल अपनी जिंदगी के बर्मा की जेल में काट चुकी हैं ! उनका केवल एक ही ध्येय  था कि  बर्मा में सैनिक शाशन की जगह लोकतंत्र की स्थापना हो ! यानी सिर्फ लोकतंत्र के लिए इतना बड़ा फैसला ?

आप विश्व भर में पाएंगे कि  जहां लोकतंत्र नहीं है वहां के लोग लोकतंत्र ,  जिसे जन तंत्र भी कहा जाता है , अपने देश में स्थापित करने की मांग कर रहे हैं ! इसका सीधा सा मतलब बनता है कि  लोकतंत्र दुनिया की  सर्वश्रेष्ठ शाषण प्रणाली है !

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अगर भारत के सन्दर्भ में हम लोकतंत्र की बात करें तो पाएंगे कि  इसी सर्वश्रेष्ठ शाषण प्रणाली का हमने मज़ाक बना के रख दिया है ! जो प्रणाली हमारे लिए बहुत प्रभावी होती थी , उसी को हमने धीरे धीरे बेअसर और निष्प्रभावी कर दिया है ! असल में , हमारी एक नियति बन गयी है कि जो चीज़ हमें आसानी से मिल जाती है हम उसका महत्व नहीं समझ पाते , उसकी प्रासंगिकता नहीं मालूम होती ! अन्यथा जिस प्रणाली को स्थापित करने के लिए बहुत सारे देशों में क्रांतियाँ हुई हैं या हो रही हैं , उसी प्रणाली को हम इतना कम कैसे आंक  सकते हैं ? हमारी अयोग्यता कहें , अज्ञानता कहें या शिक्षा के अभाव में जागरूकता की कमी कहें , हमने लोकतंत्र के महत्व को कभी समझा ही नहीं ! आज लोक तंत्र को राज्यों से लेकर केंद्र तक में सिर्फ कुछ परिवारों तक सीमित कर दिया और आम आदमी यही समझने लगा है कि ये शाषण व्यवस्था सिर्फ कुछ लोगों के चुनाव लड़ने तक सीमित है ! दुःख तो तब होता है जब पढ़ा लिखा वर्ग भी इस बात को समझने की जरुरत महसूस नहीं करता और वो बस इतना कहकर कि मुझे राजनीती में interest नहीं है कहकर इस व्यवस्था का मज़ाक बना देता है , वो चुनाव जैसे महापर्व में हिस्सा लेना अपनी तौहीन समझता है और फिर अपने घर में इन नेताओं और इस व्यवस्था को गाली देता है ! इसी वज़ह से आज लोकतंत्र को कुछ परिवारों ने बंधक बना रखा है ! मैं स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि जब भी क्रांतियाँ हुई हैं , आप विश्व का इतिहास उठाकर देख लें , कभी भी भरे पेट वालों ने क्रांतियाँ शुरू नहीं करीं ! क्रांतियाँ या आन्दोलन भूख से तड़पते लोगों ने शुरू करीं है , मजदूर और किसान के बेटों ने शुरू करीं हैं ! लेकिन हम अपना पेट भरकर ये सोच लेते हैं कि “all is well ” . इसी का परिणाम ये हो रहा है कि  भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश , तमिलनाडु , बिहार , हिमाचल प्रदेश जैसे देशों में तो लोकतंत्र की मूल परिभाषा और अब्राहम लिंकन के शब्दों को बिलकुल बदल कर रख दिया है यानी

Government of the people, by the people, for the people

को बदलकर

Government of the family , by the family , for the family
कर दिया है जो बिलकुल सटीक लगता है !


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लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद का आजकल जो हाल चल रहा है उसी से इस लेख को लिखने की प्रेरणा मिली है ! भारत के राज्यों की विधानसभाएं अपना महत्व पहले ही खो चुकी हैं ! जिन विधानसभाओं में जूतम पैजार होती हो , पोर्न फिल्में देखि जाती हों , वहां आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि  कुछ लाभकारी मिलेगा ! यही हाल हमारी संसद का न हो जाए इसके लिए आवश्यक है कि  हम इसकी गरिमा को बनाये रखें अन्यथा लोग भूल जायेंगे कि  संसद भी कोई महत्व रखती है ! हालाँकि वहां हाल में जो कुछ घटित हो रहा है वो अच्छा संकेत नहीं दे रहा है ! बिल फाड़ना या नारे बाज़ी करना , ये संसद की गरिमा को बढाने वाले कारक नहीं हो सकते ! लेकिन यही बात अगर एक आम आदमी कहता है तो वो संसद की गरिमा कम कर रहा होता है और अगर वो सांसदों की हकीकत बयान कर रहा होता है तो इसमें संसद का अपमान होता है !  मुझे नहीं पता कैसे ? हमारे माननीयों को समझना होगा कि  जो गलती आज वो जाने अनजाने कर रहे हैं वो कल नासूर बन जाएगी !

ये ज़ब्र भी देखा है तारिख की नज़रों ने
लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई  !!

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संसद जैसी मजबूत संस्था , मजबूर कैसे हो सकती है ? लेकिन हम यहाँ भूल जाते हैं कि अब वो संसद की बिल्डिंग तो है जो 1950 में संविधान के बाद अस्तित्व में आई होगी लेकिन वो सांसद नहीं दीखते ! अब हर कोई पार्टी लाइन पर बात करता है देश की लाइन पर नहीं ! संसद का इसी तरह से समय नष्ट होता रहा तो क्या अहमियत रह जाएगी इस लोकतंत्र के मंदिर की ? लेकिन जिन्हें ये समझना चाहिए वो न जाने क्यूँ ये समझना ही नहीं चाहते की आज वो जो कर रहे हैं कल उसका बहुत बुरा प्रभाव होने जा रहा है ! आप खुद इसे इस बात से समझ सकते हैं की विधानसभाओं के विषय में अब कोई क्यूँ नहीं बात करता ? क्यूंकि विधानसभा की शोभा बढाने वालों ने उन्हें एक ” ओपेरा हाउस ” बना दिया है ! दिल्ली में बैठे लोगों को ये बात समझनी होगी की कल को संसद का महत्व बना रहे इसके लिए उन्हें संसद की गरिमा का भी ख्याल रखना ही होगा अन्यथा इस मंदिर की कोई पूजा तो क्या खोज खबर  लेना भी छोड़ देगा !

असल में जब इतने बड़े मंदिर में जब येन केन प्रकारेण बस पहुँच जाना चाहता है तब वो इसके महत्त्व को कैसे समझेगा ? वहां ऐसे ऐसे लोग बैठे हैं जिन्हें आप अपने घर में जगह नहीं दे सकते और वो हमारे कर्णधार , हमारे नीति निर्माता बने बैठे हैं ! आप उनसे कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो इस मंदिर के महत्त्व को समझ पाएंगे ? संसद चलाने में जितना सहयोग पक्ष का होता है उतना ही विपक्ष का भी ! लेकिन इस सबको बेहतर तरीके से चलाने के लिए लोकसभा का अध्यक्ष या राज्य सभा का सभापति ही जिम्मेदार होता है ! लेकिन जब अध्यक्ष ही किसी दबाव में होगा , मंत्री ही उसे सदन को स्थगित करने की सलाह देने लगेंगे तो फिर उसकी मजबूरी को क्या कहा जाये ? मुझे याद आता है प्रथम लोकसभा अध्यक्क्ष श्री मावलंकर जी का एक वृतांत : नेहरु जी तब प्रधानमंत्री थे ! उन्होंने मावलंकर जी को एक चिट पहुंचवाई और कहा की मेरे केबिन में आइये , आपसे बात करनी है ! मावलंकर जी ने कहा – अध्यक्ष अपने केबिन से बाहर नहीं जाता , आप सुविधानुसार समय लेकर मुझसे मिलने आ सकते हैं ! तो ये होती है अपने पद की गरिमा ! वहां मावलंकर जी या नेहरु जी की बात नहीं थी वहां अलग अलग पद की गरिमा का विषय था ! आज के समय में क्या ऐसा संभव है ? असल में किसी संस्था या किसी पद की गरिमा तभी तक बनी रह सकती है जब उस पद पर या उस संस्था में उच्च चरित्र वाले लोग हों , अन्यथा उसकी गरिमा दिन प्रतिदिन कम होती चली जाएगी ! इसमें हम भी पूर्ण रूप से दोषी हैं ! क्यूंकि हम जैसे मूर्ख लोग दारू की एक बोतल या 1,000 हज़ार या 500 रुपये के लिए अपना वोट बेच देते हों , हम लोग भी तो ऐसे ही चुन का भेजेंगे जो सिर्फ और सिर्फ पैसे की ही कीमत जानता हो , सिर्फ पैसा गिनना जानता हो ! जिसे देश से कोई मतलब न हो , जिसे नीतियों से कोई मतलब न हो ! फिर हम कहेंगे की संसद ऐसी है की वैसी है !

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अब आरोप तो बहुत हो चुके , आलोचनाएं भी बहुत हो चुकी ! सार्थक क्या है ? उपाय क्या है ?
मित्रवर , कोई भी देश अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होता ! लेकिन उसमें निरंतर सुधार होता रहता है ! बस यही सुधार आवश्यक हैं ! संविधान में लिखी हर बात पत्थर की लकीर जैसी होती है लेकिन समय समय पर उसमें संशोधन भी किये जाते रहे हैं ! आज समय की जरुरत है की एक न्सिस्चित समय सीमा तय की जाए हर किसी सांसद के लिए की उसे इतना समय संसद में गुअजरना ही होगा , उसे तभी भत्ता मिल सकेगा ! और एक निम्न स्तर  तक आकर उसके अगले चुनाव में खड़े होने पर , या किसी भी तरह के चुनाव में हिस्सा लेने पर रोक लगाई जाए ! हमारे मानिन्यों को ये समझना होगा की वो हमेशा के लिए इस कुर्सी पर नहीं बने रहेंगे , इसलिए संसद की गरिका और उसके महत्व के लिए जरुरी है की उसे ” fruitfull” यानी उपयोगी बनाया जाए ! हमें मिलकर आन्दोलन करना होगा जिससे लोग इस विषय पर अपने आप को जाग्रत कर सकें और संसद के महत्त्व को समझ सकें , अपने वोट और उसकी कीमत को समझ सकें ! आन्दोलन , क्रांति को जन्म देते हैं और वाही क्रांति समाज और देश को सही दिशायें देती हैं
!

मैंने देखा है , लोग बाबा , महात्माओं के प्रवचन सुनने में लाखों की तादाद में इकठ्ठा होते हैं लेकिन संसद की गरिमा बचाने के लिए जितने आन्दोलन हो रहे हैं या होते रहे हैं उनमें संख्या कम होती है ! मैं इस बात के खिलाफ नहीं हूँ की बाबाओं के प्रवचन सुनाने क्यूँ जाते हैं , जाना चाहिए क्यूंकि वो एक अच्छा काम कर रहे हैं , धर्म और अध्यात्म की बात जीवन को सुखमय बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं किन्तु संसद हमारे देश का मंदिर है , उसकी प्रसगिकता , उसकी गरिमा , उसका महत्व तभी संभव है जब हम उसे जानें , उसे पहिचानें ! मित्रो , ये जीवन सिर्फ एक बार मिलता है ! यहीं आकर हम हिन्दू या मुसलमान बनते हैं , यहीं आकर हम ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य या शुद्र में विभाजित किये जाते हैं , किन्तु देश सबका एक है , संसद सबकी एक है ! आओ , लोकतंत्र के सही अर्थों को पहिचानें और अपना बेशकीमती वोट कभी 1,000 , 2,000 या दारू के भाव में न बेच डालें !
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चीमा साब की एक रचना के साथ अपनी बात ख़त्म करना चाहूँगा  !

ले मशालें चल पड़े है लोग मेरे गाँव के ,
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के .

पूछती है झोपडी और पूछते है खेत भी ,
कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के .

चीखती है हर रुकावट ठोकरों की मार से ,
बेड़ियाँ खनका रहे है लोग मेरे गाँव के .

लाल सूरज अब उगेगा देश के हर गाँव में ,

अब इक्कठा हो चले है लोग मेरे गाँव के .

देख यारा जो सुबह लगती है फीकी आजकल ,
लाल रंग उसमे भरेंगे लोग मेरे गाँव के .

ले मशाले चल पड़े है लोग मेरे गाँव के ,
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के .

जय हिन्द ! जय हिन्द की सेना !

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85 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
January 7, 2013

आपकी कलम चुंबकीय है जो सहज ही पाठकों को अपनी ओर आकष्ज्र्ञित करता है …….. पढ़कर कृतज्ञ हुआ ….. हमारे ब्लाॅग पर भी पधारें … !

    yogi sarswat के द्वारा
    January 8, 2013

    बहुत बहुत आभार आपका मित्रवर प्रवीण दिक्षित जी ! मेरे शब्दों को आपका साथ मिला ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

deepasingh के द्वारा
January 2, 2013

वन्दे मातरम योगी जी. पूर्णता लिय सम्पूर्ण लेख. जितना कहु उतना कम.बस आभार स्वीकारे.

    yogi sarswat के द्वारा
    January 3, 2013

    बहुत बहुत आभार आपका आदरणीय दीपा सिंह जी ! मेरे शब्द आप तक पहुंचे और आपका समर्थन लेकर आये ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

vijay के द्वारा
January 1, 2013

नमस्कार योगी जी सच में अब तो समय आ गया है की मशाले ही हाथो में उठाने पड़ेगी ये लोग बिना मशालो के मानेगे नहीं शानदार प्रस्तुति के लिए बधाई

    yogi sarswat के द्वारा
    January 3, 2013

    नमस्कार श्री विजय जी ! मेरे शब्दों को आपका उत्साहजनक समर्थन मिला , हार्दिक आभार ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
December 28, 2012

आदरणीय योगी जी, सादर अभिवादन! बलात्कार जैसे विषय पर आपकी बेबाक प्रतिक्रिया हर जगह देख रहा हूँ. मैंने निशा जी मित्तल के ब्लॉग पर आपसे कुछ सवाल पूछा है…. मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ – आप भी एक स्वतंत्र ब्लॉग लिखकर उचित समाधान सुझाने का प्रयास करें! धन्यवाद!

    yogi sarswat के द्वारा
    December 29, 2012

    आदरणीय श्री जवाहर सिंह जी , सादर ! आपका आदेश सर माथे , लेकिन समय इज़ाज़त नहीं दे रहा है की कुछ लिखा जा सके ! दिल में दर्द लेकर हर भारत वासी जी रहा है , न जाने वो पल कब आएगा जब सर उठाकर हम कह सकेंगे हाँ , मुझे हिंदुस्तानी होने पर गर्व है ? आज प्रतिक्रिया देते समय तक वो लड़की इस दुनिया से विदा हो गयी है , ऐसे मैं कुछ भी लिख पाना मुमकिन नहीं लगता , क्षमा चाहूँगा ! आपने मुझे सम्मान दिया , बहुत बहुत आभारी हूँ आपका !

ajay kumar pandey के द्वारा
December 26, 2012

आदरणीय योगी जी आज लोकतंत्र में हो ही क्या रहा है संसद में हंगामे आरक्षण का बिल वगेरह वगेरह हमारे देश की संसद के दिन तो सत्रों के बहाने ऐसे ही बर्बाद हो जाते हैं यह है आजकल की सरकार पहले तो सरकार ने देश को विदेशी निवेश लाकर पहले ही बेच दिया लोकतंत्र में यही सब तो हो रहा है अब हमें ऐसी सरकार लानी है जो देश के हित की बात करे और देश को न बेचे और योगी जी हम जनरल अभ्यर्थियों के लिए तो नौकरियां भी नहीं हैं हम तो बुरी हालत में आ गए हैं नौकरियों में आरक्षण नहीं होना चाहिए यह सरासर गलत है और आपने एक अच्छा लेख लिखा है वास्तव में लोकतंत्र खंड खंड हो गया है आपने निदान भी ढूंढा है लोकतंत्र को खंड खंड होने से बचाने के लिए बढ़िया लेख कभी कभी मेरे ब्लॉग पर भी दस्तक दिया करें आपके आशीर्वाद के बिना कलम में दम नहीं आता धन्यवाद

    yogi sarswat के द्वारा
    December 29, 2012

    मित्रवर अजय कुमार पाण्डेय जी , बहुत बहुत धन्यवाद आपका !

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
December 21, 2012

कलात्‍मक रचना सर वाकई ये कला तो हमें बस आपसे ही सीखने को मिल सकती है शुक्रिया हमें ऐसी खूबसूरत रचना पढवाने के लिए हमारे ब्‍लॉग पर भी अपनी राय दें लिंक http://www.praveendixit.jagaranjunction.com

    yogi sarswat के द्वारा
    December 22, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया श्री प्रवीण दीक्षित जी ! मेरे शब्दों को आपका साथ मिला ! धन्यवाद

satish mittal के द्वारा
December 20, 2012

योगी जी भारत में लोकतंत्र बचा कहाँ हें यहाँ तो वोट तंत्र बन गया हें सब फैसले वोट बैंक को ध्यान में रख कर किया जा रहें हें चाहे वो आरक्षण हो या प्रमोशन में आरक्षण हो / अल्पसंख्यक कोई नहीं पर उसे इसका तमगा दे तरह तरह की सुविधा दे वोट को ध्यान में रख फैसला हो रहा हें / यदि ये ही लोकतंत्र हें तो भला समानता का अधिकार एक जनरल केटेगिरी को हें यहाँ ?

    yogi sarswat के द्वारा
    December 21, 2012

    बिलकुल सही कह रहे हैं आप आदरणीय श्री सतीश जी ! सहमत हूँ आपसे ! मेरे शब्द आप तक पहुंचे और आपका आशीर्वाद लेकर आये , बहुत बहुत आभार ! आशीर्वाद बनाये रखियेगा , धन्यवाद

D33P के द्वारा
December 16, 2012

जब लोक तंत्र परिवार तंत्र में बदल जाता है तो देश का क्या भला होना है सहज सोचा जा सकता है !जनता उदासीन है! ,अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं !,जो हो रहा है होने दो !जब हर एक नागरिक की मानसिकता यही होगी तो लोकतंत्र किस बात का फिर तो सत्ता पक्ष के मजे ही मजे है !अपनी जेबे भरो वोट की राजनीती खेलो और राज़ करो !संसद में जब जूतेबाज़ी..वाकयुद्ध होता है तो हैरानी होती है हमारी देश की बागडोर इनके हाथ में है जिनके अन्दर शालीनता दूर दूर तक नज़र नहीं आती .जब चुनाव का समय आता है यही लोग आपके आगे हाथ जोड़कर ऐसे आते है जैसे इनसे ज्यादा शालीन और मृदु तो कोई हो ही नहीं सकता !और हम फिर बेवकूफ की तरह उन्ही को जिताकर आते है !वाह मेरे देश … ये ज़ब्र भी देखा है तारिख की नज़रों ने लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई !! योगी जी आपने इतना सुन्दर लिखा है .क्या कहे….. बहुत बहुत बधाई

    yogi sarswat के द्वारा
    December 17, 2012

    !जब हर एक नागरिक की मानसिकता यही होगी तो लोकतंत्र किस बात का फिर तो सत्ता पक्ष के मजे ही मजे है !अपनी जेबे भरो वोट की राजनीती खेलो और राज़ करो !संसद में जब जूतेबाज़ी..वाकयुद्ध होता है तो हैरानी होती है हमारी देश की बागडोर इनके हाथ में है जिनके अन्दर शालीनता दूर दूर तक नज़र नहीं आती .जब चुनाव का समय आता है यही लोग आपके आगे हाथ जोड़कर ऐसे आते है जैसे इनसे ज्यादा शालीन और मृदु तो कोई हो ही नहीं सकता !और हम फिर बेवकूफ की तरह उन्ही को जिताकर आते है !वाह मेरे देश …आपकी सटीक और प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया ये बता रही है की आप भी उसी आग में जल रही हैं जिस आग में सारा देश जल रहा है , आपके सीने में भी वाही आग है , वाही जोश और ज़ज्बा है जो हर सच्चे हिंदुस्तानी के सीने में हैं ! बहुत बहुत आभार आदरणीय दीप्ति जी ! मेरे शब्द आप तक पहुंचे

seemakanwal के द्वारा
December 15, 2012

योगी जी सोचने पर मजबूर करता आलेख .बहुत -बहुत धन्यवाद . जब सबका पैसा है मकसद फिर होगी ऐसी ही संसद .

    yogi sarswat के द्वारा
    December 17, 2012

    बहुत बहुत आभार आपका आदरणीय सीमा कंवल जी ! मेरे शब्द आप तक पहुंचे और आपका समर्थन लेकर आये ! सहयोग बनाये रखियेगा , धन्यवाद !

kpsinghorai के द्वारा
December 12, 2012

आज के समय में क्या ऐसा संभव है ? असल में किसी संस्था या किसी पद की गरिमा तभी तक बनी रह सकती है जब उस पद पर या उस संस्था में उच्च चरित्र वाले लोग हों , अन्यथा उसकी गरिमा दिन प्रतिदिन कम होती चली जाएगी ! इसमें हम भी पूर्ण रूप से दोषी हैं ! क्यूंकि हम जैसे मूर्ख लोग दारू की एक बोतल या 1,000 हज़ार या 500 रुपये के लिए अपना वोट बेच देते हों , हम लोग भी तो ऐसे ही चुन का भेजेंगे जो सिर्फ और सिर्फ पैसे की ही कीमत जानता हो , सिर्फ पैसा गिनना जानता हो ! जिसे देश से कोई मतलब न हो , जिसे नीतियों से कोई मतलब न हो ! फिर हम कहेंगे की संसद ऐसी है की वैसी है ! योगीजी निश्चित रूप से चिंतनीय लेख. साथ में उसके लिए सुझाव देकर समस्या का निदान भी दिया गया है। अच्छी प्रस्तुति….

    yogi sarswat के द्वारा
    December 13, 2012

    बहुत बहुत आभार श्री के .पी . सिंह जी ! मेरे शब्दों को आपका साथ मिला ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

prem के द्वारा
December 10, 2012

असल में जब इतने बड़े मंदिर में जब येन केन प्रकारेण बस पहुँच जाना चाहता है तब वो इसके महत्त्व को कैसे समझेगा ? वहां ऐसे ऐसे लोग बैठे हैं जिन्हें आप अपने घर में जगह नहीं दे सकते और वो हमारे कर्णधार , हमारे नीति निर्माता बने बैठे हैं ! आप उनसे कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो इस मंदिर के महत्त्व को समझ पाएंगे ? संसद चलाने में जितना सहयोग पक्ष का होता है उतना ही विपक्ष का भी ! लेकिन इस सबको बेहतर तरीके से चलाने के लिए लोकसभा का अध्यक्ष या राज्य सभा का सभापति ही जिम्मेदार होता है , लेकिन योगी जी हमारे कहने का मतलब क्या निकलता है ? ये कच्चे घड़े हैं आपने माया और मुलायम को देखा ही होगा ! क्या कह सकते हैं उन्हें !

    yogi sarswat के द्वारा
    December 13, 2012

    धन्यवाद मित्रवर ! आभार आपका

    yogi sarswat के द्वारा
    December 13, 2012

    धन्यवाद मित्रवर ! आभार आपका , sahyog banaye rakhiyega

pooja sharma के द्वारा
December 10, 2012

आप तो बहुत अच्छा लिखते हो ! लेकिन एक बात कहना चाहती हूँ लोग इन बातों को मानते तो हैं लेकिन अमल नहीं करते ! बढ़िया लेख

    yogi sarswat के द्वारा
    December 13, 2012

    धन्यवाद , पूजा शर्मा जी ! मेरे शब्द आपको पसंद आये ! सहयोग बनाये रखियेगा

satish mittal के द्वारा
December 10, 2012

योगी जी आपने लोकतंत्र के बारे में काफी कुछ लिखा आज लोकतंत्र का केन्द्रीकरण हो गया हें यह कुछ हाथों में सिमट गया हें /

    yogi sarswat के द्वारा
    December 13, 2012

    बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री सतीश मित्तल जी , मेरे शब्द आप तक पहुंचे और आपको पसंद आये ! सहयोग बनाये रखियेगा , धन्यवाद

Malik Parveen के द्वारा
December 9, 2012

पूछती है झोपडी और पूछते है खेत भी , कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के . योगी जी नमस्कार , बहुत अछा विचारनीय और सत्य से भरे लेख के लिए बधाई …. नेट की समस्या के चलते कुछ भी कमेन्ट नहीं हो पा रहे हैं …

    yogi sarswat के द्वारा
    December 10, 2012

    बहुत बहुत आभार आदरणीय परवीन मलिक जी ! मेरे शब्दों को आपका साथ और समर्थन मिला ! आगे भी आपके समर्थन की उम्मीद करता हूँ ! धन्यवाद

aman kumar के द्वारा
December 6, 2012

बहुत अच्छे भाई ! आपको सदर प्रणाम ! लाल सूरज अब उगेगा देश के हर गाँव में , अब इक्कठा हो चले है लोग मेरे गाँव के . देख यारा जो सुबह लगती है फीकी आजकल , लाल रंग उसमे भरेंगे लोग मेरे गाँव के . ले मशाले चल पड़े है लोग मेरे गाँव के , अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के . आपकी लेखनी मे आग है ! बधाई हो !

    yogi sarswat के द्वारा
    December 7, 2012

    बहुत बहुत आभार श्री अमन कुमार जी ! आपने मेरे शब्दों को समय और अपने विचारों से नवाज़ा ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

Rajesh Dubey के द्वारा
December 5, 2012

लोकतंत्र अब जनता के लिए,जनता के द्वारा नहीं रह गया है. लोकतंत्र जालसाजों के द्वारा अपने लिए हो गया है.

    yogi sarswat के द्वारा
    December 5, 2012

    सही कहा आपने श्री राजेश दुबे जी ! बहुत बहुत आभार ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

sudhajaiswal के द्वारा
December 4, 2012

आदरणीय योगी जी, सादर अभिवादन, किन शब्दों में लेख की सराहना करूँ शब्द नहीं मिल रहे, विचारणीय और बहुत ही उम्दा आलेख के लिए बहुत-बहुत बधाई |

    yogi sarswat के द्वारा
    December 5, 2012

    बहुत बहुत आभार आदरणीय सुधा जैसवाल जी ! मेरे शब्द आप तक पहुंचे और आपका आशीर्वाद लेकर आये ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

manoranjanthakur के द्वारा
December 4, 2012

कब तलक लूटते रहेंगे लोग मेरे गाव के …. सुंदर पोस्ट …बधाई

    yogi sarswat के द्वारा
    December 4, 2012

    बहुत बहुत आभार श्री मनोरंजन ठाकुर जी ! मेरे शब्दों को आपका समर्थन और सहयोग मिला ! बहुत बहुत धन्यवाद

vinitashukla के द्वारा
December 4, 2012

योगी जी, लोकतंत्र अब लूटतंत्र और वोटतंत्र बनता जा रहा है. जातिवाद, परिवारवाद, क्षेत्रवाद आदि के जरिये अपना हित साधने वाली; विविध राजनैतिक पार्टियां, लोकतंत्र के मूल पर प्रहार करती ही रहती हैं. इस आलेख के जरिये आपने, पाठकों को जागरूक बनाने का सफल और सार्थक प्रयास किया है. बधाई एवं साधुवाद.

    yogi sarswat के द्वारा
    December 4, 2012

    बहुत बहुत आभार आपका आदरणीय विनीता शुक्ल जी ! मेरे शब्दों को आपका सहयोग और समर्थन मिला ! आशीर्वाद बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

bhanuprakashsharma के द्वारा
December 4, 2012

योगी जी आपके विचारों से मैं भी सहमत हूं। साथ ही बल्ली सिंह चीमा की गजल की पंक्तियां-पूछती है झोपडी और पूछते है खेत भी , कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के,,,, आपके लेख के साथ सटीक बैठ रही हैं। 

    yogi sarswat के द्वारा
    December 4, 2012

    श्री भानुप्रकाश शर्मा जी , मेरे शब्द आप तक पहुंचे और आपका समर्थन लेकर लौटे , खुशुई हई ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
December 3, 2012

योगी जी ले मशाले चल पड़े है लोग मेरे गाँव के , अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के .सार्थक लेख ,सुंदर चित्र ,बढ़िया प्रस्तुति

    yogi sarswat के द्वारा
    December 4, 2012

    बहुत बहुत आभार आदरणीय रेखा जी ! मेरे शब्दों को आपका आशीर्वाद मिला ! धन्यवाद

ajaykr के द्वारा
December 3, 2012
    yogi sarswat के द्वारा
    December 4, 2012

    स्वागत है ! आभार

yatindranathchaturvedi के द्वारा
December 3, 2012

विचारणीय

    yogi sarswat के द्वारा
    December 4, 2012

    आभार श्री यतीन्द्र नाथ जी , सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

December 3, 2012

योगी जी बाकई बहुत ही उम्दा यथार्थ के लिये बधाई ,,,,,,,, पूछती है झोपडी और पूछते है खेत भी , कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के . चीखती है हर रुकावट ठोकरों की मार से , बेड़ियाँ खनका रहे है लोग मेरे गाँव के .

    yogi sarswat के द्वारा
    December 4, 2012

    बहुत बहुत आभार आपका श्री हिमांशु शर्मा जी ! मेरे शब्दों को आपका साथ और समर्थन मिला ! सहयोग बनाये रखियेगा , धन्यवाद

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
December 3, 2012

सूचनात्मक ,यथार्थवादी लेख ….साथ ही साथ सुन्दर प्रस्तुति . बधाई योगी जी ! http://praveendixit.jagranjunction.com/ हमारा मूल्यांकन अपने कमेंट्स से करने का कष्ट करें , धन्यवाद!

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया श्री प्रवीण दीक्षित जी ! आपने मेरे शब्दों को समय और सम्मान दिया ! धन्यवाद

y kumar के द्वारा
December 1, 2012

vahi tez tarrar vahi andaz , bahut badhiya yogi ji

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद श्री कुमार साब ! आपका सहयोग मुझे लगातार मिल रहा है ! आभार

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 1, 2012

मान्य भाई योगी सारस्वत जी, सादर अभिवादन !…….होड़ है – हौवा मिलेगा राज्य में उसके अमन ! रोज तवाड़तोड़ अब बदलाव अपने देश में !!…..परिणाम …… ढाक के तीन पात ! वस्तुतः आज यहाँ लोकतंत्र मात्र मज़ाक बनकर रह गया है ! बहुत-बहुत बधाई !!

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    आज यहाँ लोकतंत्र मात्र मज़ाक बनकर रह गया है ! सही कहा आपने आदरणीय आचार्य जी ! मेरे शब्दों तक आने और अपने कीमती विचार देने के लिए बहुत बहुत आभार ! सहयोग की कामना करता हूँ ! धन्यवाद

vijay के द्वारा
December 1, 2012

योगी जी गज़ब का विश्लेषण किया है आपने ! वो नेहरु जी का ज़माना और था , तब हमें नयी नयी आज़ादी मिली थी और लोग तथा नेता संसद और आज़ादी और लोकतंत्र का महत्व समझते थे ! आपने सही कहा की कोई चीज़ अगर आसानी से मिल जाती है तो हम उसका महत्व नहीं समझ पाते !

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    बहुत बहुत आभार मित्रवर विजय जी ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

    प्रवीण दीक्षित के द्वारा
    December 3, 2012

    सूचनात्मक ,यथार्थवादी लेख ….साथ ही साथ सुन्दर प्रस्तुति . बधाई ! http://praveendixit.jagranjunction.com/ हमारा मूल्यांकन अपने कमेंट्स से करने का कष्ट करें , धन्यवाद!

    yogi sarswat के द्वारा
    December 4, 2012

    शुक्रिया श्री प्रवीण दीक्षित जी ! मेरे शब्दों को आपका साथ मिला , सहयोग बनाये रखियेगा

aarti के द्वारा
December 1, 2012

संसद जैसी मजबूत संस्था , मजबूर कैसे हो सकती है ? लेकिन हम यहाँ भूल जाते हैं कि अब वो संसद की बिल्डिंग तो है जो 1950 में संविधान के बाद अस्तित्व में आई होगी लेकिन वो सांसद नहीं दीखते ! अब हर कोई पार्टी लाइन पर बात करता है देश की लाइन पर नहीं ! संसद का इसी तरह से समय नष्ट होता रहा तो क्या अहमियत रह जाएगी इस लोकतंत्र के मंदिर की ? लेकिन जिन्हें ये समझना चाहिए वो न जाने क्यूँ ये समझना ही नहीं चाहते की आज वो जो कर रहे हैं कल उसका बहुत बुरा प्रभाव होने जा रहा है ! आप खुद इसे इस बात से समझ सकते हैं की विधानसभाओं के विषय में अब कोई क्यूँ नहीं बात करता ? क्यूंकि विधानसभा की शोभा बढाने वालों ने उन्हें एक ” ओपेरा हाउस ” बना दिया है ! दिल्ली में बैठे लोगों को ये बात समझनी होगी की कल को संसद का महत्व बना रहे इसके लिए उन्हें संसद की गरिमा का भी ख्याल रखना ही होगा अन्यथा इस मंदिर की कोई पूजा तो क्या खोज खबर लेना भी छोड़ देगा ! आप शायद न मानें किन्तु ज्यादातर लोगों ने इस विषय में सोचना ही बंद कर दिया है की संसद में क्या होता है !

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    दिल्ली में बैठे लोगों को ये बात समझनी होगी की कल को संसद का महत्व बना रहे इसके लिए उन्हें संसद की गरिमा का भी ख्याल रखना ही होगा अन्यथा इस मंदिर की कोई पूजा तो क्या खोज खबर लेना भी छोड़ देगा ! आप शायद न मानें किन्तु ज्यादातर लोगों ने इस विषय में सोचना ही बंद कर दिया है की संसद में क्या होता है ! प्रभावी प्रतिक्रिया देने और अपना समय देने के लिए आपका कोटिशः धन्यवाद आरती जी ! सहयोग बनाये रखियेगा

Ajay के द्वारा
December 1, 2012

मुझे सिर्फ एक बात कहनी है योगी जी , जैसा लवली जी ने कहा – यथा नेता तथा प्रजा या ऐसे कह लें यथा प्रजा तथा नेता ! नेता भी तो हम में से ही बनते हैं कोई अलग से थोड़े ही आते हैं ! बहुत साथक लेखन है आपका

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    सही कहा आपने मित्रवर अजय कुमार जी ! आपकी बातों से सहमत हूँ ! मेरे शब्दों तक आने और उन्हें मान देने के लिए बहुत बहुत आभार ! सहयोग बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

lovely के द्वारा
December 1, 2012

मैंने देखा है , लोग बाबा , महात्माओं के प्रवचन सुनने में लाखों की तादाद में इकठ्ठा होते हैं लेकिन संसद की गरिमा बचाने के लिए जितने आन्दोलन हो रहे हैं या होते रहे हैं उनमें संख्या कम होती है ! मैं इस बात के खिलाफ नहीं हूँ की बाबाओं के प्रवचन सुनाने क्यूँ जाते हैं , जाना चाहिए क्यूंकि वो एक अच्छा काम कर रहे हैं , धर्म और अध्यात्म की बात जीवन को सुखमय बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं किन्तु संसद हमारे देश का मंदिर है , उसकी प्रसगिकता , उसकी गरिमा , उसका महत्व तभी संभव है जब हम उसे जानें , उसे पहिचानें ! मित्रो , ये जीवन सिर्फ एक बार मिलता है ! यहीं आकर हम हिन्दू या मुसलमान बनते हैं , यहीं आकर हम ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य या शुद्र में विभाजित किये जाते हैं , किन्तु देश सबका एक है , संसद सबकी एक है ! आओ , लोकतंत्र के सही अर्थों को पहिचानें और अपना बेशकीमती वोट कभी 1,000 , 2,000 या दारू के भाव में न बेच डालें ! is desh mein jyadatar log aise hi hain yogi ji , kitno ko samjha sakenge aap ?

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    बहुत ही प्रभावित करने वाली प्रतिक्रिया से मेरे शब्दों को सम्मान देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार लावली जी ! सहयोग बनाये रखियेगा , धन्यवाद

yamunapathak के द्वारा
December 1, 2012

योगी जी सर्वाधिक सुन्दर पंक्ति है देख यारा जो सुबह लगती है फीकी आजकल , लाल रंग उसमे भरेंगे लोग मेरे गाँव के . यह ब्लॉग बहुत सटीक विषय पर आधारित है और इसे एक संयोग ही कहूंगी की आज बल्कि नेट पर समय देने के पूर्व लोकतंत्र विषय पर ही बिटिया को पढ़ा रही थी. दरअसल हमारे देश में लोकतंत्र अपनी तीसरे पायदान पर पहुँच गया है पहला पायदान—संक्रमणकाल जब देश इस व्यवस्था में कदम रखता है दूसरा —विकास की अवस्था जो अपने देश में हो चुका तीसरा —–व्यवस्था को गहराई पाने का देश में अगर लोकतंत्र की जड़ों को गहरा करना है तो इसमें जनता की भागीदारी सर्वाधिक होगी क्योंकि लोकतंत्र में वही राजा है.और इसके लिए आपके ब्लॉग की बातों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ की राजनीति में रूचि रखी जाए. इस अनुपम मंच से जुड़ते ही मुझे इस विषय पर ब्लॉग पढ़ना बहुत अच्छा लगने लगा है. आपका अतिशय धन्यवाद.

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    आदरणीय यमुना पाठक जी , सादर नमस्कार ! मेरे शब्दों पर सहमती जताने और अपने बेशकीमती शब्दों से सम्मान देने के लिए बहुत बहुत आभार ! आशा है ऐसे ही आपका मार्गदर्शन और सहयोग मिलता रहेगा ! धन्यवाद

Sushma Gupta के द्वारा
December 1, 2012

योगी जी , भारत के विशाल लोकतंत्र की गंगा में आज अराजकता का ही कचरा सर्वस्त्र ही दीख रहा है, जिसकी सफाई की महती आवश्यकता है, तभी हमारा लोकतंत्र स्वच्छ हो पायेगा..

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    प्रभावित करने वाली प्रतिक्रिया से मेरे शब्दों को मान देने के लिए बहुत बहुत आभार आपका आदरणीय सुषमा जी ! आशीर्वाद बनाये रखियेगा , धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 1, 2012

ले मशाले चल पड़े है लोग मेरे गाँव के , अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के . आदरणीय योगी जी, सादर सार्थक लेख बधाई.

    yogi sarswat के द्वारा
    December 3, 2012

    बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा जी , मेरे शब्द आप तक पहुंचे और आपका आशीर्वाद लेकर आये ! धन्यवाद

akraktale के द्वारा
November 30, 2012

योगी जी             सादर, सुन्दर आलेख देश के प्रत्येक नागरिक को जब तक अपनी जवाबदारी का एहसास नहीं होगा. संसद में ऐसे हि लोग चुनकर जाते रहेंगे. 

    yogi sarswat के द्वारा
    December 1, 2012

    बहुत बहुत आभार श्री रक्ताले साब ! मेरे शब्दों को आपका आशीर्वाद लगातार मिल रहा है ! प्रेरणा मिलती रहती है ! सहयोग की कामना करता हूँ , धन्यवाद

satish mittal के द्वारा
November 30, 2012

अच्छी लेखन शैली के लिए बधाई

    yogi sarswat के द्वारा
    December 1, 2012

    आभार श्री सतीश जी ! मेरे शब्दों को आपका साथ मिला

mayankkumar के द्वारा
November 30, 2012

आपका लेखन पढ़ कृतज्ञ हुआ …….. सधन्यवाद !!

    yogi sarswat के द्वारा
    December 1, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया श्री मयंक कुमार जी !

jlsingh के द्वारा
November 30, 2012

आदरणीय योगी जी, सादर अभिवादन! बहुत ही सुन्दर विवेचना, उदाहरण, चित्रों से सुसज्जित आलेख पढ़कर मन प्रसन्न हुआ पर प्रसन्नता तब और जायद होगी जब इस आलेख का कुछ हिस्सा ही अपने जीवन में उतार सकें … कम से कम वोट देने अवश्य जाएँ और सही ब्यक्ति को ही वोट दें! अपने आस पास के वातावरण को जागरूक बनायें और अपने बीच इमानदार नेता पैदा करें! बहुत ही सुन्दर आलेख ! हमारे माननीयों को अपनी गरिमा समझनी चैये और हंगामे के दिन स्वयम का भत्ता नहीं लेना चाहिए ! नो वर्क नो पे! हर जगह लागू होना चाहिए!…..आपका आभार!

    yogi sarswat के द्वारा
    December 1, 2012

    सार्थक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार श्री जवाहर सिंह जी ! लेकिन ये हमारे माननीय ऐसा होने कहाँ देंगे ? बहुत बहुत शुक्रिया

Mohinder Kumar के द्वारा
November 29, 2012

योगी जी, सार्थक लेख और साथ में सुन्दर रचना के लिये बधाई. लिखते रहिये.

    yogi sarswat के द्वारा
    December 1, 2012

    आभार ! श्री मोहिंदर कुमार जी ! मेरे शब्दों को आपका सहयोग और समर्थन मिला ! धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
November 29, 2012

योगी जी,बहुत दिन बाद एक सशक्त लेख के साथ बहुत अच्छा लगा,लगता है लोकतंत्र के लायक ही हम नहीं रहे.आपने सुन्दर चित्रों के साथ अपने देश के यथार्थ को व्यक्त किया है.बधाई आपको.

    yogi sarswat के द्वारा
    December 1, 2012

    बहुत बहुत आभार आदरणीय निशा जी मित्तल ! मेरे शब्दों को आपका आशीर्वाद और सहयोग मिला ! धन्यवाद

sarita sinha के द्वारा
November 29, 2012

योगी जी नमस्कार, आपका लेख सोचने पर मजबूर करता है..भारत जैसे देश में जो विश्व का सब से बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, वहां क्या वास्तव में लोकतंत्र है?? हमने खुद ही अपना कचरा कर डाला ..किसी मुद्दे को लेकर आवाज़ उठाने वाले लोग जनसेवा की बात भूल कर पार्टी बनाने की सोचने लगते है तब वहीँ राजनीति, मतविभेद और आतंरिक कलह शुरू हो जाती है..जन सेवा भूलकर स्वयंसेवा शुरू हो जाती है… जैसे हिमालय की बर्फ से निकली हुई पवित्र शुद्ध नदियाँ जगह जगह से कचरा इकठ्ठा करते हुए आखिरकार जा कर भ्रष्टाचार के समुद्र में विलीन हो जाती हैं..यही किस्सा मुख़्तसर है….

    yogi sarswat के द्वारा
    December 1, 2012

    आपके लेखन में और प्रतिक्रिया में हमेशा ही एक नयी ताज़गी मिलती है आदरणीय सरिता सिन्हा जी ! बहुत बहुत धन्यवाद ,मेरे शब्दों को अपना आशीर्वाद देने के लिए ! आभार


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